Patriotism in Bollywood: Analyzing Iconic Films for India's 78th Independence Celebration
Celebrating 78 Years of Independence: Patriotic Bollywood Films That Inspired a Nation
१९वी शताब्दी के आखिरी दिन थे और वृद्ध हो चुकी शताब्दी के सफ़ेद पैरहन पर एक दिन सफ़ेद पारदर्शी रौशनी कुछ चित्र खींच देती है. देखते ही देखते इन चित्रों में आत्मा आ जाती है और एक दूसरी दुनिया बसने लगती है. दुनिया का सबसे नया और सबसे पूर्ण कला ,दुनिया के सामने आती है जिसे विश्व “ सिनेमा “ के नाम से जानने लगता है.
ये वो जादू था जिसमे चमत्कृत करने के भाव तब भी थे , आज भी है. सिनेमा के अपने बेहद शुरुआती दिनों में कुछ मिनट की छोटी कॉमिक फिल्मो से बड़ी फीचर फिल्म का सफर भी अत्यंत रोचक रहा। ग्रिफिथ की 'बर्थ ऑफ़ नेशन ' के पहले के ज़्यादातर फ़िल्म समय सीमा में छोटी तथा किसी एक विषय पर केंद्रित थी . छोटी छोटी फिल्म में दृश्य संयोजन के अपने अपने नियम थे लेकिन कोई सर्वमान्य नियम या उसका ग्रामर अभी विकसित नहीं हो पाया था.
(Source: https://hi.m.wikipedia.org/)
धीरे धीरे सिनेमा की विकासात्मक यात्रा में नियम, रचना , एस्थेटिक्स सब बनने लगे. सिनेमा अब समय और विस्तार में जाकर एक सम्पूर्ण कला का आकार ले चूका था जिसमे विश्व के सारे कला विधा सम्मिलित हो चुकी थी. कविता, कहानी , पेंटिंग ( किसी एक फ्रेम को फ्रीज़ पेंटिंग सरीखा होता है ) संगीत सहित सभी विधाओं के सूत्र जब इकट्ठे होकर एक माला बुनते है तो जो करिश्मा होता है , वो सिनेमा था. इस नए कला माध्यम की न सिर्फ विश्वसनीयता बढ़ रही थी वरन खुद बयानी और कहानी कहने के बेहतरीन नैरेटिव की वजह से कई साहित्यकार भी इस माध्यम को अपना रहे थे.
अपनी बेहद प्रभावित करने वाली इस अनूठी क्षमता का प्रयोग, आज़ादी से पूर्व ,फिल्मकार , दर्शको में भारतीयता का भाव जगाने के लिए करने लगे.
किसी भी देश के समाज मे एकरूपता नही होती वो भौगोलिक, सांस्कृतिक, भाषीय विभेद के कारण अपने व्यवहार और प्रतिक्रिया मे भिन्न होता है. भारत का समाज अपनी संरचना मे किसी भी देश से बिल्कुल भिन्न है. समाज के बारे मे प्रसिद्द
समाजशास्त्री
पीटर एल बर्गर ने कहा था" समाज को मनुष्य ने बनाया है लेकिन वही समाज आज मनुष्य को जीवन जीने के सलीके बताता है' इस फैले हुए समाज पर फिल्म अपना ज़ोरदार असर डालती है. हालाँकि सिनेमा
समाज
का दर्पण माना जाता है लेकिन कई बार फिल्म एक ख़ास तरह के समाज का निर्माण करने मे अहम भूमिका निभाती है.
समाज
में अलग अलग मुद्दे पर बिखरा समाज, सिनेमा के रस
में
भीगकर, एक पंक्ति में खड़ा होना प्रारम्भ कर देता है.
यही से भारतीयता और देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत फिल्म का बनना प्रारम्भ होता है. फिल्म के गीत, इसी भावना के बेहद कम समय और अधिक ग्राह्य माध्यम के कारण , तेज़ी से लोकप्रिय होने लगे. १९४२ का भारत छोडो आंदोलन अपने चरम पर था और ठीक इसी दौरान , १९४३ में 'किस्मत ' फिल्म में कवि प्रदीप ने उस वक़्त की पुलिस और सेंसर बोर्ड की आँखों से काजल निकलते हुए गीत लिखा ' 'आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है , दूर हटो ऐ दुनिया वालो ,हिन्दुस्तान हमारा है ' आज़ादी की लड़ाई में झूमते नौजवानो को इस गीत ने ऐसी घुट्टी दी की लड़ाई की धार बेहद पैनी हो गयी
अब भारत के सीने में राष्ट्र प्रेम की सुलगती अग्नि, धधकती ज्वाला का रूप ले चुकी थी. १९४७ में देश आज़ाद हो गया लेकिन उसकी आग
तपिश , बरकरार रही.
ठीक
एक साल बाद दिल में धड़कते भारत की दास्ताँ बनकर आयी ' शहीद' ने देशप्रेम की भावना को सबसे बलवती बताते हुए शहीद होने को जीवन का मोक्ष बताया.
'वतन
की राह में वतन के नौजवान शहीद हो' गीत, हर भारतीय के होंठो का संगीत बन गया था.
देश
आज़ाद तो हो गया था लेकिन पडोसी दुश्मन की साज़िशे अब भी भारत की बुनियाद में मट्ठा
डालने
की कोशिश कर रही थी.
अपने देश के प्रति प्यार और देश के बहते रक्त में एक ही भाव पिरोने की कोशिश करती फिल्म, अब मुखर होकर सतह पर थी. आज़ादी , के बाद देश अपनी सूरत संवारने में लगा हुआ था लेकिन बीच बीच में देश प्रेम और राष्ट्र निर्माण की भावना प्रखर हो जाती.
भारत पर आक्रमण और युद्द केबाद , जन भावना उफान पर होती और फिल्मकार, इस भाव को और गाढ़ा रंग देने फिल्म बनाने लगते. छठे दशक में इंडो चीन युद्ध ने प्रतिकार , हुंकार की दशा को तिरंगा रंग दे दिया. इसी दशक में 'हक़ीक़त' फिल्म ने हर हिंदुस्तानी की आवाज़ में केसरिया रंग घोल दिया. चीन की छल प्रवत्ति से छले गए भारतीय सैनिक टुकड़ी की दास्ताँ जब परदे पर आयी , सभी भारतीय की आँखे, गुस्से में छोटी आँखों वाले चीनी पर बरसने लगी. ' कर चले हम फ़िदा अब वतन साथियो , अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो; गीत सिर्फ गीत न होकर, देश को आने वाले वक़्त से सावधान और जागृत करने वाला पैग़ाम बन गया.
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(Source:https://www.lyricsia.com/) |
इसी दशक में भारत पाकिस्तान के युद्ध के बाद , देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के स्लोगन को आदेश मानकर और एक अभिनेता ने परदे के सामने के साथ, कैमरे के पीछे खड़े होने का संकल्प लिया. 'उपकार' फिल्म में 'भारत' बनकर , हर हिन्दुस्तानी को, वक़्त पड़ने पर जवान बनने की शिक्षा देते मनोज कुमार, भारत देश का चलता फिरता इंसानी रूप बन गए. फिल्म छठे दशक की बेहद कामयाब फिल्म रही. ' मेरे देश की धरती सोना उगले , उगले हीरे मोती ' गीत ने भारतीयता , राष्ट्रप्रेम , स्व राष्ट्र गौरव , का ऐसा ताना बाना बुना कि हर भारतीय खुद को दुनिया का सबसे भाग्यशाली व्यक्तिमानने लगा. हिंदुस्तान के अन्नदाता और रक्षक सेनानी के कार्य को रोशन करती उपकार ऐसी फिल्म बनी जिसे अपने प्रथम निर्देशकीय प्रयास में मनोज कुमार ने अमरत्व प्राप्त कर लिया।
अब मनोज कुमार मात्र फिल्म अभिनेता मनोज कुमार नहीं रहे बल्कि पर भारतीय होने पर गर्व के सुर साधते , अभिमान करते ऋषि पुत्र 'भारत कुमार हो गए. राष्ट्रीयता से ओत प्रोत अब भारत कुमार जो भी कदम रखते , भारत का दिल, अपने सुपुत्रके हर विजुअल संरचना पर खिल उठता. १९७० में आयी 'पूरब और पश्चिम ' ने मनोज कुमार के इस सागा को भारतीयता की श्रेष्ठता को प्रमाडित करने के ग्रन्थ के तरह कार्य किया.
अभी तक पश्चिम की तकनीकी श्रेष्ठता से भयाक्रांत भारतीय विचार को पलटते मनोज उर्फ़ भारत कुमार ने भारत के आध्यात्मिक ज्ञान, वैदिक साइंस ,संस्कार , प्रेम भाव की उत्कृष्ठता को ख़ूबसूरती से परोसा कि भारतीय के दिल से अनायास, वाह वाह निकल उठा.
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(Source: YouTube) |
इसी बीच भारतीय सिनेमा में एक जादू हुआ जिसे भारत के लोग अमिताभ बच्चन के नाम से जानते है. अपनी पहली ही फिल्म 'सात हिन्दुस्तानी' में देशप्रेम की अलख जगाते अमिताभ , उन सात हिन्दुस्तानी लड़ाके में से एक की भूमिका निभाते हैं जो गोवा को पुर्तगालियों चंगुल से निकाल कर आज़ाद करता है.
७० के दशक में अमिताभ के प्रादुर्भाव से सिनेमा चमक उठा लेकिन इस दशक में समाज की विसंगतियों से लड़ते युवा की आवाज़ और कई बार प्रतिशोध हावी हो रहे थे. इसी में बेरोज़गारी और युवा आक्रोशित नौजवान, अपनी पहचान और हक़ की लड़ाई लड़ता है लेकिन आठवे दशक के प्रारम्भ में आयी 'क्रांति ' ने इतिहास के पन्नो को पलटते हुए १९वी शताब्दी की एक कहानी को परदे पर ऐसा परोसा कि अंग्रेज़ो को फिर से देश से बाहर करने की इख़्वाहिश उठी.
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(Source: IMDb) |
इसी दशक में आयी कर्मा ने एक बार फिर , देशप्रेम की भावना को सिनेमा की मुख्यधारा में बेहद प्रमुखता स्थापित कर दिया. देश विरोधी डॉ डैंग ( अनुपम खेर ) को ख़त्म करने के लिए जेलर दादा ठाकुर , तीन फांसी की सजा पाए कैदियों को इकट्ठा करते है और डैंग की दुनिया में आग लगा देते है. सिनेमा की कहानी में जैसे बनारसी साड़ी में सोने की तरह बुना ' दिल दिया है , जान भी देंगे, ऐ वतन तेरे लिए ' जब जब बजता , हाथो की बंद मुट्ठिया , तिरंगे को देख, सलूट में बदल जाती
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(Source: https://www.lyricsoff.com/) |
९वा दशक की एक ही फिल्म ' बॉर्डर ' देश के प्रति जान गंवाने और सर्वस्व बलिदान की आंच को और गाढ़ा नारंगी कर गयी. लोंगेवाला पोस्ट को पाकिस्तानियो से बचाने के लिए मेजर कुलदीप सिंह, मुट्ठी भर सिपाहियों के साथ जान लगा देते हैं. १९७१ के भारत पाकिस्तान युद्ध की सच्ची घटना से प्रेरित बॉर्डर, दर्शको के सीने की सबसे गहरी रग से इश्क़ की भावना को निकाल,वह सिर्फ देशप्रेम लिख देती है. 'थिएटर में जब ' संदेशे आते है ' गीत उभरता , लोगो के आँखों के कोर से दरिया उफनने लगता.
२१वी शताब्दी में लगान, ग़दर , लीजेंड, ऑफ़ भगत सिंह, रंग दे बसंती, चक दे
इंडिया
जैसी बहुत सी फिल्म ने व्यावसायिक होने के बावजूद , राष्ट्रवाद और देशप्रेम को कहानी की मुख्यधारा बनाया.
पिछले
दिनों आयी एयर लिफ्ट,
उरी
, जैसी कहानिया देश के मानसिक पटल पर देश हित
का
नैरेटिव बेहद सफलता से लिखती है.
मनोरंजन के सबसे ग्राह्य माध्यम से उम्मीद और ज़िम्मेदारी की चाह बढ़ जाती है कि
राष्ट्रवाद
और देशप्रेम का माहौल निरन्तन बनाये रखने
में
, सिनेमा अपनी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी निभाता रहे और अपने प्रयास में ज़्यादा प्रखरता लाये.
©अविनाश त्रिपाठी
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