The God of Acting :Millennium Star - Amitabh Bachchan
अभिनय और आवाज़ का लाजवाब Blend - अमिताभ
सिर्फ बॉलीवुड इंडस्ट्री में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व के सिनेमा जगत में अमिताभ बच्चन को The God of Acting :Millennium Star के नामे से जाना जाता रहेगा
When Amitabh Got Injured during Coolie
८० के दशक का शुरुआती साल थे और मेरा बचपन अभी शुरू ही हुआ था. थोड़ी ज़ेहानत के बावज़ूद कच्चा दिमाग आस पास की उदासी, सुबह मंदिरो में लगता लोगो का हुजूम , एक अखबार में झांकते ढेर सारे परेशां चेहरे और शाम के टीवी समाचार में मोहल्ले के एकलौते टीवी के सामने खड़े होकर सारे मोहल्ले वालो का कुछ जानने की कोशिश करना ,मेरे लिए अजीब अनुभव था.
बारिश से भीगे एक उदास दिन मोहल्ले के बड़े भाई से पूछा तो एक और बारिश उसकी आँखों में भी झाँक गयी. आँख से निकली दो पतली पगडंडियों के साथ एक थरथराती आवाज़ निकली कि ' अमिताभ बच्चन को गहरी चोट लगी है, बचने की उम्मीद कम है.' बात ख़त्म करके भैया ने आसमान की तरफ देखा और कुछ बुदबुदाया। दिमाग सिर्फ इतना समझ पाया कि किसी बड़े इंसान की तबियत ख़राब है जिसके लिए हर इंसान बेहद फिक्रमंद है।
१९८२ में कुली की शूट की दौरान अमिताभ घायल क्या हुए ,पूरा हिंदुस्तान के दोनों हाथ दुआओ में ऊपर उठ गए. कई नास्तिक अमिताभ की दीवार की तरह उस दर पर जा पहुंचे जहाँ जाना उनके बुद्धिजीविता के अनुरूप नहीं था। बड़े बड़े त्यौहार, धार्मिक सम्मलेन , राजनीतिक रैली या कोई भी सामाजिक कार्यक्रम जो नहीं कर सकता था ,वो अभिताभ की चोट ने कर दिया, हर हिन्दू मुस्लिम या किसी भी धर्म का शख्स अमिताभ की सेहत के लिए सर झुकाये सजदे में लगा हुआ था. ये अमिताभ का जादू था.
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Childhood of Amitabh - अमिताभ का बचपन
इलाहाबाद की गलियों में पिता डा हरवंश राय बच्चन से साहित्य और ज़बान की शुद्धता का ककहरा सीख, अमिताभ जब नैनीताल के शेरवुड पहुंचे तो स्कूल की रवायत के अनुसार थिएटर का हिस्सा बन गए. शेक्सपीयर के नाटकों को करते हुए साथी बच्चो की तालिया अमिताभ के कानो में ठहर गयी. शायद अभिनेता बनने की दबी ख्वाहिश इन्ही नाटकों की देन थी. बुनियादी तालीम के बाद दिल्ली पहुंचे युवा अमिताभ अब ग्रेजुएशन के बाद उड़ना चाहते थे , एयरफोर्स की पोशाक़ और बाज की तरह हवा में लहराते विमान उनकी नयी ख्वाब की मंज़िल थी। कुछ ख्वाब का पूरा न होना देश ,समाज और कला के लिए बेहतर होता है. अमिताभ इस टूटे ख्वाब के साथ कोलकत्ता पहुंचे और शिपिंग फर्म में पसीना बहाने लगे. दिल एक बार फिर मचला तो रेडियो समाचार वाचक के ऑडिशन में अपनी आवाज़ अपने इरादों के साथ माइक्रोफोन पर रख दी.
The Initial failures of Amitabh
एक और इंकार अमिताभ को आसानी से ग़मो की राह पकड़ने को मजबूर कर सकती थी, लेकिन अमिताभ न टूटे, न गुस्सा किया, बस उस इंकार को आंच की तरह अंदर रख लिया। अमिताभ ने अपनी शख्सियत की सबसे मजबूत हुनर पर इंकार पाया था जो रह रह कर उनके अंदर धधकने लगता।
जल्दी ही इसी आवाज़ को मृणाल सेन की फिल्म 'भुवन शोम' में सूत्रधार की भूमिका मिली तो अपने बेहद साफ़ तलफ़्फ़ुज़, गहरी आवाज़ से अमिताभ ने शब्द चित्र खींच दिए. इसी साल 'सात हिंदुस्तानी ने अमिताभ को सिल्वर स्क्रीन का पहला तज़ुर्बा दिया. एक उर्दू शायर की भूमिका में गोवा की आज़ादी के लिए लड़ते अमिताभ की डेप्थ पहली ही फिल्म में नज़र आ गयी. राजेश खन्ना के किरदार के लिए गढ़ी गयी ऑथर बेस्ड फिल्म 'आनंद' में बंगाली बाबू की भूमिका में अमिताभ इस तरह रच गए कि राजेश खन्ना की मौत पर बिलखते अमिताभ की चीख में गुस्सा, अपनापन ,हार सब झलक जाता है. 'मुझसे बाते करो आनंद, ६ महीने से तुम्हारी बक बक सुन रहा हु ' कहते अमिताभ पूरी फिल्म के अभिनय पर कुछ लम्हे में भारी पड़ जाते है.
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(Amitabh with Rajesh Khhana in film "Anand") |
एक ही दृश्य में प्यार, लगाव, टूटना, आक्रोश ,बेचारगी का इतना उम्दा संतुलन और आवाज़ का आरोह अवरोह बेहद मुश्किल काम है. अमिताभ के अद्भुत टैलेंट ने इस मुश्किल काम को बेहद सहजता से कर दिया
When Amitabh Met jaya Bhaduri
शायद इसी दृश्य ने आने वाले एंग्री यंग मैन की बुनियाद रखी थी. अपनी शुरुआती फिल्म की शूट के दौरान पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट गए अमिताभ की आँखों में एक गिरह थी जो गैर मामूली थी. पुणे में अभिनय का डिप्लोमा कर रही छोटे कद की जया इस गिरह ऐसे उलझी की चाहकर भी बहार नहीं निकल पायी. लम्बे कद के अमिताभ के सीने तक पहुँचती जया शायद इससे ऊपर जाना भी नहीं चाहती थी. अमिताभ के सीने में गहरे तक जगह बनाने में कामयाब जया ज़िन्दगी में अमिताभ को अपना मान चुकी थी.
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(Amitabh with Jaya) |
गुड्डी और अभिमान में अमिताभ और जया का परस्पर प्यार बहुत हद तक स्वाभाविक था. "अभिमान ' में ज़्यादा हुनरमंद पत्नी की कामयाबी के साये में बुझते अमिताभ का मर्द जिस तरह हावी होता है, उसे बेहतर शायद ही निभाया जा सकता था. मर्द का बेहतर होना स्वाभाविक है, उसको ज़्यादा कामयाब होने का हक़ है ,इसी परंपरा में जीते पुरुष समाज का मेल ईगो किस कदर घायल होता है , इसके रेशे रेशे की पड़ताल करती फिल्म अमिताभ के अभिनय के नए प्रतिमान स्थापित करती है. इसी तरह सौदागर में अपने से ज़्यादा उम्र की लड़की के साथ विवाहकर अमिताभ का किरदार अपने घरेलु व्यापार को जिस तरह बढ़ाने की कोशिश करता है और प्यार को दरकिनार कर जीवन में पैसे को तरज़ीह देता है. बेहद संतुलित अभिनय और किरदार की गहरी समझ के बावजूद अमिताभ की फिल्म अभी परदे में सोना नहीं उगल रही थी. ज़्यादातर फिल्म गिने चुने दर्शको की तारीफ का बायस बन कर सिमट गयी थी.
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The Emergence of Angry Young Man
इसी बीच प्रकाश मेहरा को गुस्से और आक्रोश से भरे ऐसे चेहरे की तलाश थी जो समाज से बुराई ख़त्म करने में प्रतिबद्ध हो और उसका गुस्सा जायज़ लगे। कई अभिनेता के इंकार के बाद जावेद अख्तर और प्राण ने मेहरा के सामने एक ऐसे लड़के को खड़ा का कर दिया जो कामयाब तो नहीं था लेकिन जिसमे निचली तह में ठंडी दिखती सफ़ेद आंच की तरह आग धधक रही थी. मेहरा को अपना विजय मिल चुका था.
१९७३ में आयी 'जंजीर' अमिताभ के महानायक बनने के सफर का पहला पत्थर बनी .आज़ादी के ढाई दशक बीतने के बाद भी युवा बेरोज़गार था लेकिन भ्रष्ट सिस्टम के आगे अब नग्मे गाने को तैयार नहीं था. उसमे चिंगारी बस गयी थी , ये चिंगारी सलीम जावेद के कलम से गुज़रते हुए जब अमिताभ तक पहुंची तो दावानल हो चुकी थी. १९७५ अमिताभ के एंग्री यंग मन और सुपरस्टारडम दोनों पर मुहर का साल था. दीवार'' में मिल मज़दूरों के हाथ थामने की कोशिश में पिता ,मालिक का हाथ पकड़ने को मजबूर हो जाते है , आत्मग्लानि का दंश झेलते पिता पत्नी और बच्चो को छोड़कर अज्ञातवास पर निकल जाते है. एक दृश्य में अमिताभ अपनी माँ से कहते है 'कि तुम चाहती की मैं भी मुँह छुपा कर भाग जाता " पिता पर कटाक्ष करते हुए अमिताभ अपनी ज़्यादातर बात इशारो में कहते है. इसी फिल्म को दो आइकोनिक सीन्स में अमिताभ इतने कद्दावर हो जाते है की ७० एम एम का पर्दा बौना लगने लगते है। 'साइन अगर लेना है तो जाओ ' बोलते वक़्त अमिताभ बेहद लम्बे डायलॉग का अंत सिर्फ साँसों के आरोह अवरोह से करते है. बिना शब्द के भी उनका स्वर साफ़ सुनाई देता है.
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(Amitabh with Nirupa Roy and Shashi Kapor in the memorable scene in "Deewar") |
Epitome of silent love in "Sholey"
इसी साल रिलीज़ 'शोले' अमिताभ के किरदार के खामोश प्यार की अदायगी उनके अभिनय का विस्तार है।
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(Amitabh with Jaya in film "Sholey") |
अपने वन लाइनर से पूरे फिल्म में तालिया इकट्ठे करते अमिताभ जब फिल्म के अंत में मरते है ,सिनेमा हॉल की हर पंक्ति से सिसकने की आवाज़ तेज़ हो जाती है. अब तक अमिताभ पर एंग्री यंग मन का ख़िताब चस्पा हो चूका था लेकिन बहु आयामी और आश्चर्यजनक रूप से सभी किरदार में पिक्चर परफेक्ट सरीखे अमिताभ 'चुपके चुपके ' में हास्य का वो रस घोलते है जो कोई भी समकालीन मुख्य अभिनेता नहीं करता था. शायद उत्तर प्रदेश की मिटटी का सहज हास्य व्यंग अमिताभ को खून में मिला था. अंग्रेजी का प्रोफेसर बॉटनी के करोला में ऐसा उलझता है कि करेला में अपनी पनाहगाह ढूंढता है।
A son who was against his father
अब तक सिनेमेटिक ब्रिलियंस हासिल कर चुके अमिताभ जब त्रिशूल में बाप के सामने खड़े खड़े होते है तो मजबूर धोखा खाई माँ के नाजायज़ बेटे का एक एक कदम जायज़ लगता है। लगभग हर फिल्म में बाप की खिलाफत और बगावत और माँ से बेपनाह मोहब्बत करता अमिताभ का किरदार ,जावेद अख्तर की ख़ुदबयानी लगता है। अपने जातीय जीवन में माँ साफिया के बेहद करीब और पिता जां निसार अख्तर के साथ बगावत करते जावेद अक्सर अमिताभ के मुँह से अपने जज़्बात कह उठते। सलीम जावेद के इस आक्रोश से भरे किरदार से इतर इश्क़ में शराफत, नज़ाक़त, लताफत से भरे शायर की भूमिका मिली तो लोगो को ऐतबार नहीं हुआ कि ये किरदार अमिताभ निभा सकते है.
The angry young man becomes most romantic poet
यश चोपड़ा की 'कभी कभी' में शायर अमिताभ टूट कर मोहब्बत करते है. इस मोहब्बत में शाइस्तगी है, पाकीज़गी है और पाने की बजाय मोहब्बत के ऊँचे मयार को कायम रखना है. 'कभी कभी के मशहूर डायलॉग में अमिताभ अपनी मोहब्बत का पूरा फलसफा रूहानी या लगभग आसमानी आवाज़ में कह देते है. पहली बार लगा कि मोहब्बत किसी को देखने से भर ही नहीं होती, सुनकर भी हो सकती है. . 'कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि ज़िन्दगी तेरी ज़ुल्फो की नरम छाँव में शादाब हो भी सकती थी ' मगर ये हो न सका ' कहते अमिताभ मोहब्बत में फ़िराक़ के ग़म को इतना ग्रेसफुल बना देते है जहाँ बिछड़ने और बेवफाई की कड़वाहट नहीं उसका ऐतराफ़ है। रिश्तो के ऐसी ही पेचीदगी पर बनी फिल्म 'सिलसिला' जिसमे अमिताभ की जातीय ज़िन्दगी की झलक भी देखी जा सकती थी , अमिताभ के पूर्णकालिक अभिनेता पर मोहर है. 'डॉन' , 'मुकद्दर का सिकंदर' जैसी कई फिल्मे अमिताभ के स्टारडम का नतीजा रही. एक ऐसा दौर आ गया जहाँ कहा जाने लगा कि महज़ अमिताभ का पोस्टर भी किसी फिल्म की तरह ३ घंटा देखा जा सकता है. उस दौर के लोग बताते है कि अमिताभ के लिए टिकट खिड़की पर इस कदर भीड़ जुटती थी कि लगभग हर शहर में पुलिस को व्यवस्था सँभालने आना पड़ता था.
The all rounder Amitabh
'अमर अकबर अन्थोनी ' में हास्य को उसके सोफिस्टिकेटेड पीक तक पहुंचाने में अमिताभ की बड़ी भूमिका थी. अब वो दौर आ गया था की फिल्म चलने के लिए अलग से हास्य अभिनेता का पैबंद ज़रूरी नहीं था. अमिताभ सब कुछ बखूबी कर रहे थे. अमिताभ अब दन्त कथा में बदल रहे थे। किसी जीते जागते इंसान की लोकप्रियता इस शिखर तक कभी नहीं पहुंची थी। ६ फुट २ इंच का हाड मांस का ये शख्स किवदंती की तरह देखा जाने लगा था. ८० के दशक में आयी 'शक्ति' न सिर्फ दो महानतम अभिनेताओं के अभिनय क्राफ्ट की आमने सामने टक्कर की वजह से विख्यात हुई वरन दिलीप कुमार के लिए लिखी इस फिल्म में अमिताभ कई जगह कद्दावर साबित हुए. अपने पिता की ईमानदारी का दंश झेलते अमिताभ के मन में बचपन से पिता दिलीप कुमार के लिए विद्रोह उपज जाता है. 'जहाँ अपनी पत्नी और अमिताभ की माँ की सूचना देते भावुक दिलीप, अभिनय के आकाश को छू लेते है वही आखिरी सन में दिलीप कुमार की गोदी में मरते अमिताभ पूरी अभिनय का निचोड़ इस दृश्य में डाल देते है.
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(Amitabh with Dilip Kumar in a still of film "Shakti" ) |
The lovable " Sharabi "
पिता के प्यार और अपनेपन के लिए तरसता विजय एक बार अमिताभ की शक्ल धर 'शराबी' में दिखता है जो पिता प्राण की बेशुमार दौलत नहीं, उनसे अपने लिए कुछ लम्हे उधार मांगता है. दिवाली के एक पटाखे के हाथ में फुट जाने से घायल हाथ को पैंट की जेब में छिपाये अमिताभ इस तरह प्रभावशाली लगे कि उस दौर का हर नौजवान दांया हाथ जेब और बाए हाँथ से बात करने लगा था.
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(Amitabh in film "Sharabi") |
A parallel Cinema Film - Mai Azaad hu
'मैं आज़ाद हु' फिल्म में अख़बार की रिपोर्टर समाज के बेहतरी के लिए एक छद्म किरदार बनाती है और किरदार कागज़ो से निकल लोगो के दिल में जा बसता है. इसी किताबी किरदार को ज़िंदा करते अमिताभ अपने अभिनय के शीर्ष पर दिखाई देते है. फिल्म के एक दृश्य में बेहद भूखे अमिताभ ज़मीन पर पड़े सेब को लोगो की नज़र बचाकर उठाने की कोशिश में हर सिनेमा प्रेमी की नज़र में बहुत ऊँचे उठ जाते है.
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(Amitabh in film "Mai Azaad Hu") |
कांचा चीन्हा के साम्राज्य के खिलाफ खड़ा छोटा सा बच्चा जब बड़ा हो जाता है उसके बूट में अपना पैर डाल देता है. साहित्य कर्मी और बुद्धिजीवियों के बीच परवरिश और तरबीयत के ठीक उलट अमिताभ एक लोकप्रिय डॉन की भूमिका को इस कदर आत्मसात कर लेते है कि सालो तक उनका बोला डायलॉग 'विजय दीनानाथ चौहान ' लोगो की जुबां पर चढ़ा रहा. अब कई तरह की शारीरिक व्याधियों से जूझ रहे अमिताभ जब परदे पर दिखाई देते तो कही मजबूत दिखते.
Film
"Black " brought Gold for Amitabh
अपनी जिस्मानी कमज़ोरियों में इरादों का लोहा भरते अमिताभ ' ब्लैक' में बुज़ुर्ग शराबी टीचर की भूमिका में है जो कभी नीम नीम ,कभी शहद शहद होकर अपनी मूक बघिर शिष्या के लिए किसी भी हद्द तक चला जाता है.
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(Amitabh in film" Black" with Rani Mukharji) |
बीमारी के किरदार में अगला कदम पा' का था जिसमे प्रोगेरिआ से जूझते अमिताभ १२ वर्ष में ६० के दिखाई देते है. उम्र को धता बताते इस बेहद मुश्किल किरदार में अमिताभ ने एक ऐसे बच्चे का किरदार निभाया जो बेहद हंसमुख है और खतरनाक बीमारी से ग्रसित है. मोहब्बतें ,खाकी , पीकू , पिंक न जाने कितनी कहानियो में अमिताभ सिर्फ अपनी उपस्थिति से फिल्म का मयार उरूज़ तक ले जाते रहे है. मशहूर फ़्रांसिसी निर्देशक फ्रांकोइस त्रूफो ने अमिताभ को जहाँ वन मन इंडस्ट्री कहा, वही सत्यजीत रे, गुलज़ार सरीखे निर्दशको को मलाल रहा कि वे इस अद्भुत, अविश्वश्नीय अभिनेता के साथ काम नहीं कर पाए. सत्यजीत रे ने ठीक कहा था कि बड़ा स्टार और बड़ा अभिनेता दो अलग अलग बात है, सिर्फ अमिताभ इन दोनों मापदंडो पर पूरी तरह खरे उतरते है नृत्य , गायन , एक्शन , हास्य ,इश्क़ , आक्रोश ,गुस्सा , संवेदना, का इतना बड़ा अभिनेता न हुआ है न होगा..
©अविनाश त्रिपाठी
Very well written
ReplyDeleteThanks , he is biggest star and actor of india
ReplyDeleteVery true n very well written. Actors boasting of getting box office collection of hundreds of crores are just superficial actors n more of businessmen
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